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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verses 11–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 15, verses 11–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 11-13

संस्कृत श्लोक

हा तनो शवनामासि तापसंशोषमागता । कङ्कालतां प्रयातासि मां भीषयसि दुर्भगे ॥ ११ ॥ देहेनाहंविलासेषु येनैव मुदितोऽभवम् । कङ्कालतामुपगतात्तस्मादेव बिभेम्यहम् ॥ १२ ॥ ताराजालसमाकारो यत्र हारोऽभवत्पुरा । ममोरसि निलीयन्ते तत्र पश्य पिपीलिकाः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे शरीर, तुम्हारा नाम शव पड़ गया है, सूर्य के सन्ताप से तुम शोषको प्राप्त हो गये हो ओर कगालता को प्राप्त हो गये हो, हे दुर्भाग्य, तुम इस समय मुझे डरा रहे हो, जिस देह से मैं विविध विलासो के समय प्रसन्न हुआ था, इस समय कंकालता को प्राप्त हुए उसी से मैं डर रहा हूँ। जिस शरीर में पहले ताराओं के समूह के तुल्य हार सुशोभित हुआ था उसी मेरे शरीर के वक्षस्थल में इस समय चींटियाँ घुस रही हैं, इसे आप देखिये