Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 15, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
द्रवत्काञ्चनकान्तेन लोभं नीता वराङ्गनाः ।
येन मद्वपुषा तेन पश्य कङ्कालतोह्यते ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस पिघले हुए सुवर्णं के समान रमणीय
मेरे शरीर से सुन्दर-सुन्दर अंगनाएँ काम से मोहित हुई थी, देखिये, वही इस समय ककालता को
धारण कर रहा है