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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 17, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

प्रत्येकमुदितं चित्तं स्वस्वभावोदरस्थितम् । इदमित्थं समारम्भं जगत्पश्यन्विनश्यति ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने अनादि अज्ञान के मध्य में स्थित चित्त ही इस प्रकार के विविध व्यापारों से युक्त, प्रत्येक जीव में उदित यह जगत है, यों जानता हुआ स्वयं विनष्ट हो जाता है अर्थात्‌ ब्रह्मरूप हो जाता है