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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verse 28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 17, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । एष संसृतिखण्डोत्थो मिथः स मिलति स्वयम् । नो वा मिलति तन्मे त्वं यथावद्वक्तुमर्हसि ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि ऐसा है, तो मनुष्य ओर उसके संसार को अन्य लोग नहीं देख सकेंगे, ऐसी अवस्था में गुरुजनों की शिष्यों के उद्धार के लिए प्रवृत्ति और शास्त्ररचना स्वप्न में किये गये परोपकार के तुल्य शिष्यो को प्राप्त न होगी, ऐसी अवस्था में उपदेश न मिलने के कारण शिष्य को मोक्ष की प्राप्ति न होगी, इस प्रकार अनिर्मोक्ष प्रसंग हो जायेगा, यों यह कल्पना मूलघातिनी ही हुई, इस आशय से रामचन्द्रजी पूछते हैं : हे भगवन्‌, उदित हुए ये संसार यदि स्वयं परस्पर नहीं मिलते, तो पूर्वोक्त अनिर्मोक्षप्रसंगरूप दोष प्राप्त होता हे । यदि मिलते हैं, तो यह सर्वसाधारण संसार अलग-अलग एक-एक के ज्ञान से बाधित नहीं हो सकेगा, इस प्रकार उभयतःपाशारज्जु प्रतीत होती हे । कृपा कर आप मेरे इस सन्देह को यथार्थ रीति से दूर कीजिये