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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 17, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

मनोनिर्मलसत्त्वात्म यद्भावयति यादृशम् । तत्तथाशु भवत्येव यथावर्तो भवेत्पयः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्य ब्रह्मवेत्ताओं के भी सत्यसंकल्पत्व में राग आदि दोषों के क्षय से होनेवाली शुद्ध चिति की सत्यात्मभावापत्ति ही हेतु है, इस आशय से कहते हैं। सम्पूर्ण एषणाओं की (वित्तैषणा, पुत्रैषणा, लोकैषणा आदिकी) निवृत्ति होने पर शुद्ध चित्त पुरुष की जो स्थिति है, वही सत्य आत्मतत्त्व कहा जाता है, वही निर्मल चिति कही गई है॥। ३॥ निर्मल सत्त्वरूप मन जिस वस्तु की जैसी भावना करता है, जैसे जल आवर्तरूप हो जाता है, वैसे ही शीघ्र वैसा हो जाता है