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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verses 2–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 17, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इयं प्रथममुत्पन्ना सा तनुर्ब्रह्मणः पदात् । शुद्धा जातिर्भार्गवस्य नान्यजन्मकलङ्किता ॥ २ ॥ सर्वैषणानां संशान्तौ शुद्धचित्तस्य या स्थितिः । तत्सत्यमुच्यते सैषा विमला चिदुदाहृता ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रतिभाओं के फलोपभोग द्वारा सफल होने में दो कारण हैं, एक तो सत्यसंकल्पता के योग्य वित्तशुचि और दूसरा उत्क्रमणकाल में उद्बुद्ध परिपक्व भावी जन्म में भोग देनेवाले कर्मो की उत्कटता। उनमें से मनोरथ की सफलता का वित्तशुद्धिरूप पहला कारण शुक्राचार्य में था, यह दर्शाते हुए समाधान करते हैं । शुक्राचार्यजी के प्रथम कल्प के सब दोषों का उस कल्प के अन्तिम जन्म में किये गये कर्म और उपासनाओं से क्षय हो गया था, इस कल्प में उनका यह शरीर पहले-पहल उत्पन्न हुआ था, इसलिए इस कल्प के दोष भी उसमें न थे | ब्रह्मपद से ही अधिकार भोग के लिए ब्रह्मा के संकल्प से वह उत्पन्न हुआ था, अतएव ब्रह्मा के सांकल्पिक दोष भी उसमें न थे। दोनों कुलों में शुद्ध ब्राह्मण जाति का था, अतएव बीज, गर्भ, जाति आदि के दोष भी “उसमें न थे, यही सब कारण हैं कि उनमें असत्य संकल्प की प्राप्ति थी, यही औरों से उनमें विशेषता है