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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 17, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । भगवन्भृगुपुत्रस्य प्रतिभासानुभूतितः । यथैषा सफला जाता तथान्यस्य न किं भवेत् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

शुक्राचार्यजी का अप्सरा, स्वर्ग, आदि मनोरथ चिरकाल के उपभोग से जैसे सफल सा हुआ था वैसे ओर लोगो के मनोरथ सफल क्यो नहीं होते 2 ऐसी श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, भृगुपुत्र शुक्राचार्य के मनोरथ की प्रतिभा जैसे स्वर्ग आदि के अनुभव से सफल हुई वैसे औरों की मनोरथ की प्रतिभा क्यों नहीं सफल होती ?

सर्ग सन्दर्भ

सोलहवाँ सर्ग समाप्त सत्रहवाँ सर्ग शुद्ध चित्तं की सत्यसंकल्पता का वर्णन ।