Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सर्वसंसृतिखण्डेषु भूतबीजकलात्मनः ।
तन्मात्रप्रतिभासस्य प्रतिभासेन भिन्नता ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्तशुद्धि की चरम सीमा दर्शाते हुए उसकी प्राप्ति से ही तत्त्वज्ञता और दृढ़ परमप्राप्ति प्रतिष्ठित
होती है, अन्यथा नहीं, यो उपसंहार करते हैं।
वासना का आत्यन्तिक क्षय ही, जो एकरूप है और संवेदन से रहित है, चित्त की परम शुद्धि है।
चित्त की शुद्धि से पुरुष शीघ्र प्रबुद्ध हो जाता है | प्रबुद्धपुरूष चित्त की पूर्वोक्त चिन्मात्रपरिशेषरूप शुद्धि
की प्राप्ति से परम कैवल्यरूप मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ३ १॥
सत्रहवाँ सर्ग समाप्त
अठारहवाँ सर्ग
मलिन चित्तो का मलिन चित्तों के साथ सम्बन्ध, जाग्रत आदि अवस्थाओं के शोधन से
चिन्मात्रपरिशेषरूप शुद्धि का लाभ और ज्ञानी की मोक्षप्राप्ति का वर्णन ।
शुद्ध मनोराज्य का शुद्ध और मलिनों के साथ सम्मेलन प्रकार पहले कहा जा चुका है, अब मलिनों
का मलिनों के साथ मेलन प्रकार तथा जाग्रदादि अवस्थाओं और द्रष्टा, दृश्य आदि के शोधन द्वारा पूर्व
सर्ग के अन्तिम श्लोक में कही गई चित्त की चिन्मात्रपरिशेषरूप सिद्धि की प्राप्ति ओर उसके द्वारा मुक्ति
प्राप्ति बतलाने के लिए पूर्वोक्त जाग्रदादि प्रपंचभेद को आत्मा के असाधारण प्रतिभास के अधीन प्रतिभास
से सिद्ध करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, सब जीवों की अपने-अपने द्वारा कल्पित संसाररूप
सृष्टि के टुकड़ों मे स्थूल, सूक्ष्म और कारणरूप प्रपंच की प्रत्येक जीव मेँ जो भिन्नता कही गई है, वह
स्वयं प्रकाश चिदेकरस आत्मा की प्रतिनियताकार कल्पना से ही है, वस्तुतः नहीं है