Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
स्वमेव जायतेऽस्वाभं न च तज्जायतेऽन्यदृक् ।
अतो न जातं नाजातं विद्धि ब्रह्म नभो जगत् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
तब गौणी वृत्ति से उपमा देने का क्या फल है ? इस पर कहते है।
ब्रह्म ही अनात्मा के तुल्य उत्पन्न होता है, यह दशनि के लिए गौणवृत्ति से उपमा दी गई हे । वस्तुतः
ब्रह्म अन्य की तरह उत्पन्न नहीं होता, इसलिए न तो ब्रह्म को उत्पन्न हुआ जानिये और न अनुत्पन्न ही
जानिये, अतः जगत शून्य है