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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

मृगतृष्णाजलभ्रान्तौ सत्यां कैव विदग्धता । विदग्धतायां सत्यां तु कैवासौ मृगतृष्णिका ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

यद्यपि उसकी पूणनिन्द स्वप्रकाशता स्वाभाविक है, तथा विभ्रान्ति पैदा होने पर वह व्यर्थ हो गई, इस आशय से कहते है । यदि मरूभूमि की मृगतृष्णा में जलप्रान्ति है, तो यह मृगतृष्णा है, यह अभिज्ञता कहाँ ? यदि यह जल नहीं है, यह अभिज्ञता है, तो मृगतृष्णा कर्हौँ ? भाव यह कि भ्रान्ति होने पर अभिज्ञता रह नहीं सकती