Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
आकाशविशदो द्रष्टा सर्वाङ्गोऽपि न पश्यति ।
नेत्रं निजमिवात्मानं दृशीभूतमहो भ्रमः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
निर्मल, स्वप्रकाश, सर्वगत होने से आत्मा यद्यपि सदा सबके स्पष्टरूप से दर्शन योग्य है, तथापि
कभी कोड भी उसको यथार्थरूप से नहीं देख सकता, यह बहिर्मुख लोगों की भ्रान्ति की प्रबलता पर
महान आश्चर्य है, ऐसा कहते है।
जैसे नेत्र बहिर्मुख होने के कारण अपने स्वरूप को नहीं देख सकता, वैसे ही सम्पूर्ण अंगों से युक्त
आकाश की तरह निर्मल द्रष्टा भी बहिर्मुख होने के कारण साक्षात अपने स्वरूप को नहीं देख पाता, यह
भ्रम की बड़ी विरमयकारिता हे