Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
आकाशविशदो द्रष्टा सर्वाङ्गोऽपि न पश्यति ।
तेषां निजमिवात्मानं दृशीभूतमिवाभ्रमः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे बहिर्मुख पुरुष भीतर अपने आत्मा को भले ही न देखे, पर बाहर के और लोगो
के आत्मा को उसे देखना चाहिए, इस पर कहते है।
जैसे सर्वथा भ्रमशून्य मुक्त पुरुष दृश्यता को प्राप्त हुए द्वैत को नहीं देखता, वैसे ही सर्वागपूर्ण
आकाश के तुल्य निर्मल द्रष्टा बहिर्मुख होने के कारण अपने आत्मा की तरह बाहर के सब लोगों के भी
परमार्थिक स्वरूप को नहीं देखता है