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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

आकाशविशदं ब्रह्म यत्नेनापि न लभ्यते । दृश्ये दृश्यतया दृष्टे त्वस्य लाभः सुदूरतः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

आकाश के तुल्य निर्मल ब्रह्म यत्न से भी प्राप्त नहीं होता । दृश्य को दृश्य रूप से देखने पर तो उसका लाभ बहुत दूर है, इसलिए दृश्य को दृश्य रूप से नहीं देखना चाहिये, किन्तु दृक्‌मात्र रूप से देखना चाहिये, यह भाव है