Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
स्वयं प्रकचति स्फारदेहश्चिदणुखण्डकः ।
नेत्रादिकुसुमद्वारैः संविदामोदमुद्गिरन् ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
चिद्रूपी
परमाणु खूब विकसित शरीर होकर नेत्र आदिरूप पुष्प द्वारों से संविद्रूपी सुगन्धि को बिखेरते हुए
स्वयं स्फुरित हुए हैं