Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
संपश्यतितरां कश्चिद्वहीरूपेण चिद्धटः ।
सर्वगत्वादनाशित्वादृश्यबीजस्य वै चितेः ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
कोई व्यष्टिरूप चिद्घट (घडे के सदुश स्थूलदेह के परिचछेद से चेतन ही
मानों घट ठहरा यानी जीव) दृश्य के हेतुभूत चेतन के सर्वव्यापक और अविनाशी होने के कारण देशतः
ओर कालतः बाह्य रूप से जगत को देखता है