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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 56

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 56

संस्कृत श्लोक

अन्तरेवाखिलं कश्चित्पश्यत्यविमलं जगत् । तत्रातिकालकलनादुन्मज्जति निमज्जति ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

कोई समष्टिरूप (विराट्‌) जगत को साफ-साफ अपने अन्दर ही देखता है । वहाँ पर चिरकाल के अभ्यास से तादात्म्य अभिमान होने से लीन होता है और फिर आविर्भूत होता है