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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

स्वप्नात्स्वप्नान्तरं तत्र तथा पश्यन्पुनःपुनः । मिथ्या वटेषु लुठति शिलेव शिखरच्युता ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

जगत में एक स्वप्नरूप जगत से दूसरे स्वप्नरूप जगत को एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न के समान पुनः-पुनः देख रहा वह पर्वत की चोटी से गिरी हुई शिला के समान गर्तरूप मिथ्या योनियों में लुढ़कता है