Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 67
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 67
संस्कृत श्लोक
विवेकोऽस्ति वचस्येव चित्रेऽग्निरिव भास्वरः ।
यस्य तेनापरित्यक्ता दुःखायैवाविवेकिता ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
विवेक भी यदि वैराग्य, मुमुक्षा की उत्कण्ठा होने से सन्यास, श्रवण आदि फल में पर्यवसन्न हो, तो
वही तत्त्वदर्शन रूप तन्मात्रयुक्ति की उत्पत्ति और स्थिति के उपयोगी होता है, केवल वाणीमात्र से
विकसित विवेक उक्त फल नहीं दे सकता है, ऐसा दशति हैं।
चित्र में देदीप्यमान अग्नि के समान जिसके वचन में ही केवल विवेक है, मन में नहीं है; उस पुरुष
के द्वारा अपरित्यक्त अविवेकिता केवल दुःख के लिए ही है। यानी जैसे चित्र मे स्थित प्रकाशमान अग्नि
से दाह आदि नहीं होते, वैसे ही वचनमात्र विवेक से फल सिद्ध नहीं होता है