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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 19, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

जीवाकारा कला काचिच्चितिः स्वच्छतयात्मनि । दशामायाति सौषुप्तिं सौम्यवातां विचेतनाम् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शंका हो कि तब “(तीर्णो हि तदा सव्िकान्‌ हदयस्य भवति (हदय में स्थित बुद्धि से सव शोको को तर जाता है), (सलिल एको दरष्टाऽद्वैतो भवति “(उस समय सजातीय भेदशून्य ओर विजातीय भेदशून्य एकमात्र द्रष्टा होता है) इत्यादि श्रुतियों द्वारा कहे गये अत्यन्तिक ब्रह्मैक्य की क्या गति होगी 2 इस पर कहते हैं। जीव के आकार की जो कोई चिति है, वह चेतन की कला उपाधि का विनाश होने से स्वच्छतावश ब्रह्मात्मा में पृथक्‌ चेतनशून्य, प्राणवायु से किये गये विक्षेप से शून्य सुषुप्ति दशा को प्राप्त होती है, इस अंश को लेकर वे श्रुतियाँ प्रवृत्त हुई हैं, भेदवासना के विलय के अभिप्राय से प्रवृत्त नहीं हुई हैं, यह भाव है