Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 19, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
जीवोऽन्तरेव स्फुरति तैलसंविद्यथा तिले ।
शीतसंविद्धिम इव स्नेहसंविद्यथा घृते ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतोभवति" (हे सौम्य, सुषुप्ति के
समय जीव सत्“ शब्दवाच्य ब्रह्म से एकीभूत हो जाता है, अपने पारमार्थिक रूप को प्राप्त होता है) इस
श्रुति से सुषुप्ति में जीव का ब्रह्म मेँ लय सुना जाता है, फिर उस समय आप जीव की दीप के तुल्य
स्थिति कैसे कहते हैं 2 इस पर कहते है ।
"मैं जीव हूँ” इस संस्कार से युक्त ही वह तिल में तैलसंवित् के तुल्य, बर्फ में शीतसंवित् के तुल्य
ओर घृत में स्नेह संवित् के तुल्य ब्रह्मभाव को प्राप्त होकर स्फुरित होता है