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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 19, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

ततः सरति नाङ्गेषु संवित्क्षुभ्यति तेन नो । न चेक्षणादीन्यायाति रन्ध्राण्यायाति नो बहिः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

उससे शरीर के भीतर स्थित नाड़ियों मे संवित्‌ का संचार नहीं होता; अतः पुरुष विक्षोभ को प्राप्त नहीं होता हे । इससे स्वप्न के निमित्त का अभाव दर्शाया ।ओर वह संवित्‌ इन्द्रियाँ आदि छिद्रों में भी नहीं आती; अतएव इन्द्रियों द्वारा बाहर भी नहीं आती । इससे जाग्रत के निमित्त का अभाव दिखलाया