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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 19, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

जीवधातुर्यदा वातैः किंचित्संक्षुभ्यते भृशम् । ततोऽस्म्यहं सुप्त इति पश्यत्यात्मनि खे गतिम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

सुप्त जीव चेतन जब प्राण वायुओं से थोड़ा बहुत क्षुब्ध होता है तब “मैं हूँ” ऐसा अपने को अहंकारयुक्त देखता है; किन्तु जब अत्यन्त क्षोभ को प्राप्त होता है तब आकाश में अपना गमन देखता है