Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 19, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
अनाक्रान्तेन्द्रियच्छिद्रो यतः क्षुब्धोऽन्तरेव सः ।
संविदानुभवत्याशु स स्वप्न इति कथ्यते ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राणवायु से भीतर ही क्षुब्ध हुआ, अतएव
इन्द्रियच्छिद्रों पर अपने आक्रमणों से रहित जीव अपनी संवित् से आन्तर पदार्थो का तुरन्त अनुभव
करता है, वही स्वप्न कहा जाता है