Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 2, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
पूर्व प्रध्वंसनान्योन्याभावैर्यदुपशाम्यति ।
न शाम्यत्येव तच्चित्ते शाम्यत्येव तु दृश्यते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
श्रुति के निषेध से पहले जगत
के घट, पट आदि मुद्गर प्रहार आदि से नाश द्वारा और अन्य वस्तु के रूप से अन्योन्याभाव द्वारा जो
शान्त होते हैं यानी “यह इस समय नष्ट हो गया "घट, पटादि यह नहीं है” इस प्रकार ग्रहण किये जा रहे
अभाव को प्राप्त होते हैं, वे शान्त नहीं होते यानी वह उपशम नहीं; किन्तु तिरोहित होने से चक्षु आदि
द्वारा दृश्यता का उपराममात्र है, क्योकि चित्त मे वासनारूप से वे शान्त होते ही नहीं है । इसी न्याय को
प्रागभाव और अत्यन्त अभाव में भी लगाना चाहिये । अपनी सत्ता से अथवा ब्रह्मसत्ता से सत् घट आदि
की बाधके बिना कहीं पर भी असत्ता नहीं होती, क्योकि मिड़ी का पिण्ड, भूतल आदि में घट के अदर्शन
की तिरोधान से भी उपपत्ति हो सकती है