Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 2, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
सर्गादौ सर्गरूपेण ब्रह्मैवात्मनि तिष्ठति ।
यथास्थितमनाकारं क्व जन्यजनकक्रमः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ को ही स्पष्ट करते हैं।
सृष्टि के आरम्भ में सृष्टि रूप से यथा स्थित निराकार ब्रह्म ही अपने स्वरूप में स्थित होता है,
इसलिए जन्य-जनक सम्बन्ध कहाँ ?