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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 2, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 2, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

तस्मात्पदे जगच्छान्तमास्ते तत्सहकारिभिः । चित्तात्प्रसरतीत्युक्तिर्वालस्य न विपश्चितः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार सांख्य आदि की कल्पना बालक की कल्पना के तुल्य है, यों उपसंहार करते हैं। इसलिए प्रलयकाल में प्रकृतिसहित पुरुष में जगत तिरोहित रहता है और सहकारी कारणों द्वारा वह चित्त से आविर्भूत होता है, यह उक्ति बालक की ही है, विद्वान की नहीं