Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verses 1–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 21, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
भगवन्सर्वधर्मज्ञ संशयो यो महानयम् ।
हृदि व्यावर्तते लोलः कल्लोल इव सागरे ॥ १ ॥
दिक्कालाद्यनवच्छिन्ने तते नित्ये निरामये ।
म्लाना संविन्मनोनाम्नी कुतः केयमुपस्थिता ॥ २ ॥
यस्मादन्यन्न नामास्ति न भूतं न भविष्यति ।
कुतः कीदृक्कथं तत्र कलङ्कस्तस्य विद्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
जो वस्तु तुच्छ नहीं है, आयासरहित है, उपाधिशून्य है और भ्रमरहित है उसका यत्न से अनुसन्धान
करो, ऐसा गुरुजी के कहने पर अपने बुद्धि कौशल से उसका अनुसन्धान कर उसमें मन की कल्पना की
योग्यता को न देख रहे श्रीरामचन्द्रजी पूर्वोक्त मन की कल्पना में विश्वास न रखते हुए अर्धविकसित
बुद्धि होकर पूछने के लिए गुरूजी को अपनी ओर आकृष्ट कर संशय दिखलाते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्, हे सम्पूर्ण धर्मो के मर्मज्ञ, सागर में चंचल कल्लोल की तरह मेरे
हृदय में जो यह बड़ा भारी संशय घूम रहा है, उसे आप कृपाकर दूर कीजिये । देशकृत परिच्छेद न होने
के कारण सर्वत्र व्याप्त, कालकृत परिच्छेद न होने के कारण नित्य और वस्तुकृत परिच्छेद न होने के
कारण निर्दोष परमात्मा में मन नाम की विषयाकार कलुषित यह संवित् कौन है और कहाँ से आई है ?
यदि कहिये, अनादि अविद्यावश यह उपस्थित हुई है, तो उसकी भी संभावना नहीं है, क्योंकि जिससे
भिन्न दूसरी वस्तु न तो है, न थी और न होगी, उसमें किसी दूसरे निमित्त से या स्वतः अथवा दूसरे
प्रकार से कलंक कैसे प्राप्त हो सकता है ?
सर्ग सन्दर्भ
बीसवाँ सर्ग समाप्त इक्कीसवाँ सर्ग विशुद्ध पुरुष मेँ कल्पक का अभाव होने से मन की कल्पना नहीं होती और अविशुद्ध में मन की सिद्धि होने से अनेक मत-मतान्तरों की कल्पनाएँ होती हैं, यह कथन ।