Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 21, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
एवं प्रकृतिरूपेयं मनोमननधर्मिणी ।
कर्मेति राम निर्णीतं सर्वैरेव मुमुक्षुभिः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त रीति से चैतन्य में मलिनता
अज्ञानियों के अनुभव से सिद्ध है । उस मालिन्य से उपहित वह चैतन्य प्रकृतिरूप होता है, मनन
धर्मयुक्त होकर मन होता है, सुनता हुआ कान और देखता हुआ नेत्र होता है, क्योकि "पश्यंश्चक्षुः
श्रृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनः" इत्यादि श्रुति है। तथा कर्मेन्द्रियाँ को प्राप्त हुआ यह चेष्टा से धर्माधर्मरूप
कर्म भी स्वयं ही होता है, ऐसा मुमुक्षु लोगों ने श्रुति आदि प्रमाणो से निर्णय कर रक्खा है