Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verses 35–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 21, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
दृश्यं संपरिडिम्भं स्वं तुच्छं परिहरन्मनः ।
तज्जाभ्यां सुखदुःखाभ्यां नावश्यं परिकृष्यते ॥ ३५ ॥
अपवित्रमसद्रूपं मोहनं भयकारणम् ।
दृश्यमाभासमाभोगि बन्धमाभावयानघ ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
मुक्ति के लिए किस वस्तु का दृढ़ अभ्यास करना चाहिये, ऐसी कोड यदि शंका करे, तो उस पर
दश्यमार्जन का ही अभ्यास करना चाहिये, ऐसा कहते हैं।
भली-भाँति आलिंगन करके बालक की तरह स्नेह से दृश्य को उत्पन्न करनेवाला अपना मन उस
दृश्य का त्याग करता हुआ दृश्य से उत्पन्न होनेवाले सुख और दुःखों से किसी प्रकार आकृष्ट नहीं
होता