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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verse 34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 21, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

यस्त्वकृत्रिम आनन्दस्तदर्थं प्रयतैर्नरैः । मनस्तन्मयतां नेयं येनासौ समवाप्यते ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि इस प्रकार के तुच्छ फल में भी दृढ़ अभ्यास की अपेक्षा है, तो अनादि सांसारिक विपरीत भावना से तिरस्कृत, अकृत्रिम आनन्दस्वरूप मोक्ष के फल में दृढ़ अभ्यास की अपेक्षा है, इसमें कहना ही क्या है ? इस आशय से कहते हैं। जो अकृत्रिम आनन्द है, उसके लिए प्रयत्नशील हुए मनुष्यों को अपना मन अकृत्रिम आनन्दमयता को प्राप्त कर देना चाहिये, जिससे कि वह प्राप्त हो जाय