Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 21, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
न निम्बेक्षू कटुस्वादू शीतोष्णौ नेन्दुपावकौ ।
यद्यथा परमाभ्यस्तमुपलब्धं तथैव तत् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
नीम ओर ईख ये दोनों कड्वे या
मीठे नहीं है । चन्द्रमा ओर अग्नि शीत ओर गर्म नहीं ह । जिसका जैसा अभ्यास हुआ, वेसा ही अनुभूत
होता है अतएव चन्द्रमण्डल और सूर्य, अग्नि आदि के मण्डलो मे निवास करनेवाले देवताओं को शीत
(५) जैनों के मत में जीव से लेकर मोक्षपर्यन्त सात पदार्थ हैं उनमें जीव चेतन शरीर परिमाण
हे । पत्थर आदि अजीव हैँ, इन्द्रियवर्ग आस्रव कहलाता है, कोई लोग विवेक को संवर कहते हैं और
कोई यम, नियमादि को संवर कहते हैँ । केशलुचन आदि तपस्या निर्जर कहलाती है । बार-बार
जन्म-मरण बन्धन है । बन्धन के उच्छेद से अलोकाकाश में सदा ऊर्ध्वगमन मोक्ष है । इन सात
पदार्थो का साधक सप्तभंगी न्याय है । सद्वादी, असद्वादी, सदसद्रादी, अनिर्वचनीयवादी, इस प्रकार
चार प्रकार के वादी हैँ । अनिर्वचनीयवाद में भी सत् आदि के भेद से फिर तीन प्रकार के वादी होते है,
यों कुल मिलाकर सात प्रकार के वादी हैँ सद्रादी यदि आर्हत से पूछे, तुम्हारे मत में मोक्ष आदि है ?
तो वह कहते है स्यादस्ति, 'स्यात्” तिंत प्रतिरूपक अल्पार्थक या कथंचिदर्थक अव्यय है असत्वादी
आदि के प्रति पूछने पर क्रमशः स्यान्नास्ति“ आदि उत्तर होते हैं । इससे पूछनेवाले चुप हो जायेंगे,
यह आर्हतों का मनोरथ है ।
ओर उष्ण आदि की पीड़ा नहीं होती