Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verses 6–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 21, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 6,7
संस्कृत श्लोक
प्रश्नस्यास्य तु हे राम न कालस्तव संप्रति ।
सिद्धान्तः कथ्यते यत्र तत्रायं प्रश्न उच्यते ॥ ६ ॥
सिद्धान्तकाले भवता प्रष्टव्योऽहमिदं परम् ।
करामलकवत्तेन सिद्धान्तस्ते भविष्यति ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
शुद्ध चिदात्मा में अविद्या का कलंक युक्त नहीं है, यह प्रश्न जो पुरुष शुद्धात्मा का अनुभव कर
चुका है, उसे शोभा देता है; लेकिन उसके प्रति तो हम मन का निरूपण कर नहीं रहे हैं, जिससे कि उसे
पूछने का अवसर मिले, किन्तु जिसने शुद्ध आत्मा का अनुभव नहीं किया है, ज्ञाता को ही आत्मा
समझता है, उसे अपने अनुभव से विरुद्ध आत्मा की शुद्धि कैसे है ? यही शंका करनी चाहिए, अनुभव
से विरुद्ध शुद्धि स्वीकार कर शुद्ध में मालिन्य कैसे है ? इस तरह के प्रश्न का अज्ञ के उपदेश के समय में
विज्ञ के समान अवसर नहीं है, ऐसा श्रीवसिष्ठटजी कहते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, इस समय आपके इस प्रश्न का अवसर ही नहीं है । निर्वाण प्रकरण में जबकि
आत्मदर्शन समाधि की प्रतिष्ठा प्राप्त हो जायेगी, अनुभव में आरूढ इसी अर्थ को मैं अपने अनुभव के
संवाद के लिए कहूँगा, वहाँ पर आपके इस प्रश्न का समाधान दिया जायेगा। सिद्धान्त के समय आपको
यह प्रश्न मुझसे पूछना चाहिए | मुझसे समाहित इस प्रश्न से सिद्धान्त आपको हस्तामलकवत् हो
जायेगा