Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 21, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
स्फटिकममननं यथा विशन्ति प्रकटतया न च रञ्जना विचित्रा ।
इह हि विमननं तथा विशन्तु प्रकटतया भुवनैषणा भवन्तम् ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा द्वैत की प्रतीति हो, तथापि निर्विकार आत्मा का बोध होने के कारण स्फटिक के समान
स्वच्छ आपका स्फटिक की तरह उनसे अनुरंजन न हो, ऐसा कहते हैं।
जैसे प्रतिबिम्बित पदार्थों की पुनः पुनः प्राप्ति होने पर भी उनके राग आदि के संसर्ग से रहित
स्फटिक में भाँति-भाँति के रंग प्रकटरूप से प्रविष्ट नहीं होते हैं, वैसे ही प्रतिबिम्बित पदार्थों का पुनः
पुनः अनुसंधान होने पर भी राग आदि की वासना के आधान से रहित आप में प्रारब्ध भोग के उचित
जगद्व्यवहार की इच्छाएँ प्रकटरूप से प्रविष्ट न हों