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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 22, Verses 1–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 22, verses 1–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 22 · श्लोक 1-8

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । जन्तोः कृतविचारस्य विगलद्वृत्तिचेतसः । मननं त्यजतो ज्ञात्वा किंचित्परिणतात्मनः ॥ १ ॥ दृश्यं संत्यजतो हेयमुपादेयमुपेयुषः । द्रष्टारं पश्यतो दृश्यमद्रष्टारमपश्यतः ॥ २ ॥ जागर्तव्ये परे तत्त्वे जागरूकस्य जीवतः । सुप्तस्य घनसंमोहमये संसारवर्त्मनि ॥ ३ ॥ पर्यन्तात्यन्तवैराग्यात्सरसेष्वरसेष्वपि । भोगेष्वाभोगरम्येषु विरक्तस्य निराशिषः ॥ ४ ॥ व्रजत्यात्माम्भसैकत्वं जीर्णंजाड्ये नभस्यलम् । गलत्यपगतासङ्गे हिमापूर इवातपे ॥ ५ ॥ तरङ्गितासु कल्लोलजललोलान्तरासु च । शाम्यन्तीष्वथ तृष्णासु नदीष्विव घनात्यये ॥ ६ ॥ संसारवासनाजाले खगजाल इवाखुना । त्रोटिते हृदयग्रन्थौ श्लथे वैराग्यरंहसा ॥ ७ ॥ कातकं फलमासाद्य यथा वारि प्रसीदति । तथा विज्ञानवशतः स्वभावः संप्रसीदति ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञान की फलभूत जीवन्मुक्तावस्था के अनुभव का प्रकार बतलाने के लिए श्रवण, मनन आदि के वृद्धि क्रम से जैसे-जैसे ज्ञान दृढ़ होता है वैसे -वैसे अधिकाधिक दोषों का क्षय होता है, यह पहले दशती हैं। जो नित्य और अनित्य वस्तु के विवेक से सम्पन्न है, जिसका चित्त वृत्तियों को त्याग रहा है, जो समाधि के अभ्यास द्वारा ज्ञान प्राप्तकर क्रम से बाह्य तथा आन्तर मनन का त्याग कर रहा है, जिसका मन कुछ विशुद्ध आत्माकाररूप से परिणत हो गया है, जो दृश्य और अज्ञान की भूमिकाओं का परित्याग कर रहा है, जो उपादेय यानी ज्ञान की भूमिकाओं को प्राप्त हो चुका है, जो द्रष्टा यानी प्रमाता को भी साक्षी चित्‌ से वेद्य यानी दृश्यभूत देख रहा है, जो भासक वित्‌ से अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं देख रहा है, जो यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः“ इस भगवद्राक्य के अनुसार जागरण के उचित परम तत्त्व में ही जाग रहा है तथा निविड अज्ञान के विकारभूत संसार मार्ग में सोया हुआ है और जो सम्पूर्ण तुच्छ सुखो से लेकर हिरणयगर्भ पद पर्यन्त सुखो में अत्यन्त वैराग्य होने के कारण क्रमिक मोक्षरूपी सुख से युक्त तथा उसकी हीन एवं भोगकालतक ही रमणीय ऐहिक भोग के साधन, माला, चन्दन आदि मेँ विरक्त अतएव लोकसंग्रह के लिए क्रियमाण कर्मफल तथा प्रारब्ध कर्म से प्राप्त भोगो में निस्पृह है, ऐसे अधिकारी पुरुष का अनादि जड़ अज्ञानरूपी आकाश के परमात्मरूपी जल के साथ एेक्य को प्राप्त होने पर, आसक्तिहीन अज्ञानाकाश के नमक के टुकड़े के समान रसावशेष होने पर नहीं, किन्तु धूप में बर्फ समूह की भोति निरवशेष गल जाने पर तथा जैसे वर्षाकाल के व्यतीत हो जाने पर बड़ी-बड़ी तरगों से भरे हुए जल से चंचल मध्यभागवाली तरंगयुक्त नदियाँ शान्त हो जाती हैं, वैसे ही बड़ी-बड़ी तरंगों से भरे हुए जल के तुल्य चंचल स्वरूपवाली विविध विषयरूपी तरगों से युक्त तृष्णाओं के शान्त होने पर तथा जैसे चूहे के द्वारा चिड़ियों के जाल काटे जाते हैं, वैसे ही वैराग्य के आवेग से संसारवासनारूपी जाल के तोडने पर अतएव हृदय की ग्रन्थि के ढीली पड़ जाने पर जैसे कतक के फल से (निर्मली से) जल स्वच्छ हो जाता है, वैसे ही विज्ञान की दृढता से स्वभाव यानी मन प्रसन्नता को (स्वच्छता को) प्राप्त हो जाता है

सर्ग सन्दर्भ

इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त बाईसवाँ सर्ग दृढ़ बोध हो जाने पर सब दोषों के विनाश, मन की प्रसन्नता ओर विशुद्ध आत्मतत्त्व के साक्षात्कार का वर्णन ।