Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 23, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 16-17
संस्कृत श्लोक
धीवरत्रादृढाबद्धचपलेन्द्रियमर्कटा ।
वदनोद्यानहसनपुष्पोद्गममनोरमा ॥ १६ ॥
स्वशरीरमनोज्ञस्य सर्वसौभाग्यसुन्दरी ।
सुखायैव न दुःखाय परमाय हिताय च ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसमें बुद्धिरूपी
रस्सी से चपल इन्द्रियरूपी बन्दर वैधे हँ । बदनरूपी उद्यान के हास्यरूपी पुष्पों के विकास से यह
मनोहर है । सकल सौभाग्यो से सुन्दर यह देह तत्त्वज्ञानी के परमसुख ओर उपदेश आदि द्वारा परोपकार
के लिए है, दुःख के लिए नहीं हे