Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 23, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
विनष्टे देहनगरे ज्ञस्य नष्टं न किंचन ।
आक्रान्तकुम्भाकाशस्य खस्य कुम्भक्षये यथा ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे घड़े के नष्ट होने पर जिसने घटाकाश को
अपने में मिला लिया, ऐसे आकाश का कुछ भी नष्ट नहीं होता, वैसे ही इस देहरूपी नगरी के नष्ट होने
पर ज्ञानी का कुछ भी नष्ट नहीं हुआ