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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 25, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 25, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 25 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

त्रैलोक्यमपि चान्विष्यन्न देवाँल्लब्धवानथ । परेणापि प्रयत्नेन निधानमिव दुष्कृती ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे पापी पुरुष निधि को नहीं पा सकता, वैसे ही बड़े प्रयत्न से तीनों लोकों को खोजकर भी वह देवताओं को न पा सका