Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 26, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 26, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
चञ्चत्सपक्षशैलेन्द्रपक्षपातचलद्ध्वनिः ।
कठिनापूरणोद्धूतस्फुटच्छैलेन्द्रकन्दरः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माण्डरूपी दीवार में टकराकर लौटने से बढ़ा हुआ और उद्गम स्थान से भी निकलता हुआ वह
कोलाहल प्राणियों से ताडित एवं प्राणियों के आगारभूत महास्रोत के जलप्रवाह की ध्वनि के तुल्य था
जो किसी पर्वत आदि से टकरा कर रुका हो और अपने उद्गम स्थान से भी निकलता हो ॥ २ ३॥ इधर-
उधर उड़ रहे पक्षधारी पर्वतराजो के पंखों के वायु से मानों उसमें ध्वनि हो रही थी, उसने कर्णकटु शब्द
प्रवाह से व्याप्त हिमालय आदि पर्वतों की कन्दराओं को फूट रहे कानों की तरह बना दिया था