Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 26, Verses 33–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 26, verses 33–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 33-36
संस्कृत श्लोक
लुठद्दैत्यवलोद्भूतमत्तास्रौघजलान्वितम् ।
रक्तधौतनरौघोग्रमुक्तनादद्रवज्जनम् ॥ ३३ ॥
लोकपानीकपाम्भोजच्छन्नाच्छन्नयमान्वितम् ।
पुनः सुरासुरैर्घातैर्दृष्टसैन्यकुलाकुलम् ॥ ३४ ॥
सपक्षपर्वताकारदानवाद्रिगमागमैः ।
वहच्छवशवाशब्दभूरिभाङ्कारभीषणम् ॥ ३५ ॥
आयुधाग्रविभिन्नोग्रदैत्यपर्वतनिर्झरैः ।
रक्तैररुणिताशेषवसुधार्णवपर्वतम् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
वह युद्ध गिर
रही दैत्य सेना से उत्पन्न हुई अथाह रक्त-राशिरूप जल से युक्त था । उसमें खून से लथ-पथ मनुष्यों
द्वारा छोड गये घोर सिंहनाद से लोग इधर-उधर भाग रहे थे, वह लोकपालों के सेनापतिरूपी कमलो में
भोरे के समान कभी मरते हुए लोगों के प्राण हरने के लिए छिपे हुए और कभी युद्ध के लिए प्रकट यम से
युक्त था, सुर और असुरों द्वारा भागने के समय किये गये प्रहारो से ताडित अतएव फिर लौटकर प्रहार
कर रहे सेन्यसमूह से व्याप्त था, पंखवाले पर्वतो के आकार के सदुश आकारवाले दानवरूपी पर्वतो के
गमनागमन से हो रहे साँय-साँय शब्द की भनभनाहटों से भीषण था तथा आयुधो के अग्रभागो से
छिन्न-भिन्न भयंकर दैत्यरूपी पर्वतो के झरने के सदुश रक्तप्रवाहों से समस्त पृथ्वी, सागर ओर पर्वत
उससे लाल हो गये थे