Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 26, Verses 37–39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 26, verses 37–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 37-39
संस्कृत श्लोक
उत्सन्नराष्ट्रनगरविपिनग्रामगह्वरम् ।
धृतासंख्यासुरेभाश्वमनुष्यशवपर्वतम् ॥ ३७ ॥
सुतालोत्तालनाराचराजिरोचितवारणम् ।
मुष्टिप्रहारपिष्टांसमत्तैरावणवारणम् ॥ ३८ ॥
कल्पाभ्रपटलासारधारादलितपर्वतम् ।
महाशनिविनिष्पेषपिष्टोड्डीनकुलाचलम् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
राष्ट्र, नगर, वन ग्राम और गुफाएँ सब के सब नष्ट हो गये थे, असंख्य असुर, हाथी, घोडे ओर
मनुष्यों के शवों से सब मेरु आदि पर्वत पूर्ण हो गये थे, उसमें सुन्दर ताल के समान ऊँचे बाणों की
पंक्तियाँ से हाथी चमक रहे थे। मुद्ठियों के प्रहारो से मत्त एेरावत आदि गजराजो के कुम्भस्थल पीसे गये
थे । प्रलयकाल के तुल्य विशाल मेघपटल की मुसलाधार वृष्टियों से पर्वत विदीर्ण हो गये थे और बड़े
भारी वज के गिरने से खूब पीसे गये कुलाचल (पर्वत) उड गये थे