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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 26, Verses 46–51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 26, verses 46–51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 46-51

संस्कृत श्लोक

अस्त्रोद्गीर्णायुधानीकनीरन्ध्रसकलाम्बरम् । शिलावर्षास्त्रदलितं वह्निवर्षास्त्रभासुरम् ॥ ४६ ॥ पताकास्पृष्टशशिकैश्चक्रचीत्कारगर्जितैः । मुहूर्तेन रथैर्लङ्घितोदयास्तमयाचलम् ॥ ४७ ॥ वज्रप्रहाराविरतम्रियमाणमहासुरम् । शुक्रामरमहाविद्याजीवमानमहासुरम् ॥ ४८ ॥ विद्रवद्देवसंघातं जयप्रोड्डामरामरम् । शुभग्रहमहाकेतुमालिकानामितस्ततः ॥ ४९ ॥ उत्पातमङ्गलौघानां बुद्धेरुद्धरकन्धरम् । साद्रिखोर्वीसमुद्रद्युजगद्रुधिरवारिधि ॥ ५० ॥ फुल्लैककिंशुकवनं कुर्वद्दुर्वारवैरतः । पर्वतप्रतिमासंख्यं शवपूर्णमहार्णवम् ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

असुर और पिशाचों के अस्त्रो से उत्पन्न किये गये तोमर, मुद्गर, मुसल आदि अस्त्रो की परम्परा से सारे आकाश में तिल रखने की भी जगह न थी, शिलाओं की वृष्टि से वह छिन्न-भिन्न था, अग्नि की वर्षा से प्रकाशमान था, अपनी पताकाओं से जिन्होंने चन्द्रमा का स्पर्श कर रक्खा था, चक्रों के चित्काररूपी गर्जन से युक्त रथों ने उसमें एक मुहूर्त मे उदयाचल ओर अस्ताचल पर्वत को लाँघ दिया था, वज के प्रहार से निरन्तर महाअसुर मर रहे थे ओर शुक्राचार्य जी की अमरनामक मृतसंजीवनी महाविद्या से महाअसुर पुनः जीवन पा रहे थे । कहीं पर देवताओं की सेना भाग रही थी, कहीं पर विजय से देवता लोग हर्ष मना रहे थे, कहीं पर इधर-उधर शुभग्रह ओर महाकेतु की पंक्तियों के दर्शन के लिए लोग ऊपर को गर्दन किये थे ओर कहीं पर उत्पातो के ओर मंगलो के दर्शन के लिए गर्दन ऊपर किये हुए थे । पर्वत, आकाश, पृथ्वी ओर द्युलोक सहित सारा जगत ही उसमें रुधिर का समुद्र बन गया थे, वह युद्ध दुर्वार वैर से सम्पूर्णं जगत को ही फूला हुआ एकमात्र पलाश का वन बना रहा था एवं पर्वतं के सदृश असंख्य शवों से भरा महासागर था