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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 26, Verses 52–54

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 26, verses 52–54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 52-54

संस्कृत श्लोक

समग्रतरुशाखाग्रलम्बलोलमहाशवम् । दीप्यमानैः स्ववातार्तैः पक्षपुष्पैर्लसत्फलैः ॥ ५२ ॥ तालोत्तालैः शरव्रातवनैर्व्याप्तनभस्थलम् । पर्वतप्रतिमासंख्यकबन्धशतबाहुभिः ॥ ५३ ॥ नृत्यद्भिः पातिताम्भोदविमानसुरतारकम् । शरशक्तिगदाप्रासपट्टिशप्रोतपर्वतम् ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

सब वृक्षों की शाखाओं के अग्रभाग में बड़े-बड़े चंचल शव झूल रहे थे। बाणराशि के वन रूप से निरूपण करने के लिए विशेषण देते हैं। उसमें सूर्य की किरणों के प्रतिबिम्बरूपी पल्लवं से दैदीप्यमान, अपने वेग के वायु से चंचल, कक आदि पक्षियों के पंखरूपी फूलों से युक्त, लोहाग्रभागरूपी चमकीले फलवाले, तालों से भी अधिक ऊँचे बाणसमूहरूपी वनों से सारा आकाशमण्डल व्याप्त था, पर्वत के सदुश विशाल, असंख्य, नाच रही कबन्धों की सैकड़ों बाहुओं से मेघ, विमान, देवता और तारे गिराये गये थे और बाण, शक्ति, गदा, भाले, पद्टिश से पर्वत आच्छन्न हो गये