Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 26, Verses 55–57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 26, verses 55–57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 26 · श्लोक 55-57
संस्कृत श्लोक
लोकसप्तकविभ्रष्टकुड्यखण्डचिताम्बरम् ।
अनारतरसन्मत्तकल्पाभ्रदृढदुन्दुभि ॥ ५५ ॥
एवं शब्दशतोन्नादपातालतलवारणम् ।
विनायककराकृष्टदीर्घदानवपर्वतम् ॥ ५६ ॥
एकदिक्करनिष्पन्दसिद्धसाध्यमरुद्गणम् ।
पलायमानगन्धर्वकिन्नरामरचारणम् ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें सातों लोकों से गिरे हुए दीवार के टुकड़ों सा
सारा आकाश व्याप्त था, कल्पकाल के भीषणमेघों के गर्जन-तर्जन तुल्य निरन्तर दुन्दुभि बज रही
थी, इस प्रकार के सैकड़ों शब्दों से पाताल में रहनेवाले हाथी प्रतिगर्जन कर रहे थे, विनायकों के द्वारा
हाथों से विशाल दानवरूपी पर्वत खींचे जा रहे थे, दिशाओं का विभाग करनेवाले सूर्य आदि के एक
दिशा में मिलने पर सिद्ध, साध्य और मरुद्गण असुरों के भय से सन्त्रस्त अतएव निश्चल थे तथा
गन्धर्व, किन्नर, देवता ओर चारण भाग रहे थे