Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 27, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 27, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
धीरोऽप्यतिबहुज्ञोऽपि कुलजोऽपि महानपि ।
तृष्णया बध्यते जन्तुः सिंहः शृङ्खलया यथा ॥ ३२ ॥
देहपादपसंस्थस्य हृदयालयगामिनः ।
तृष्णा चित्तखगस्येयं वागुरा परिकल्पिता ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सिंह श्रृंखला से बाँधा जाता है वैसे ही अत्यन्त धीर, अत्यन्त बहुज्ञ, कुलीन ओर
महान पुरुष भी तृष्णा से बाँधा जाता है