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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 28, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 28, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्युक्त्वा भगवान्देवांस्तत्रैवान्तर्धिमाययौ । वेलावनितटे शब्दं कृत्वेवाम्बुतरङ्गकः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे समुद्र की तरंग तीर भूमि के तट पर शब्द करके अन्तर्हित हो जाती है, वैसे ही भगवान ब्रह्मा देवताओं को यह उपदेश देकर वहीं पर अन्तर्हित हो गये

सर्ग सन्दर्भ

सत्ताईसवाँ सर्ग समाप्त अड्डाईसवाँ सर्ग विश्राम को प्राप्त हुए देवता ओर दानवो का, वासनोदय होने तक चिरकालीन युद्ध का पुनः विस्तार से वर्णन ।