Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 28, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 28, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 28 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
अनन्तदृक्प्रसृतविकारकारिणी क्षयोदयोन्मुखसुखदुःखशंसिनी ।
रणक्रियासुरसुरघट्टसंकटा तदाभवत्खलु सदृशीह संसृतेः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
इन्द्रादि देवताओं
के विस्तृत भय आदि का विकार करानेवाली (अविद्यापक्ष में त्रिविध परिच्छेद शून्य आत्मचैतन्य मेँ फैले
हुए जगद्रूप विकार को करानेवाली क्षयोन्मुख और उदयोन्मुख लोगों के लिए सुख और दुःख को
कहनेवाली, प्रसिद्ध सूर ओर असुरों के (अविद्यापक्ष में अशास्त्रीय चित्तवृत्ति रूप असुरों के और शास्त्रीय
चित्तवृत्तिरूप सुरों के) परस्पर समागम से संकटाकीर्ण रणक्रिया अविद्यादि संसार के सदुश हुई