Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 29, Verses 1–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 29, verses 1–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 1-4

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एवंप्रायाकुलारम्भैरसुरैरसुहारिभिः । सहसा हृतसंरब्धैरारब्धः सुमहान् रणः ॥ १ ॥ माययाथ विवादेन सन्धिना विग्रहेण च । पलायनेन धैर्येण च्छन्नगोपायनेन च ॥ २ ॥ कार्पण्येनास्त्रयुद्धेन स्वान्तर्धानैश्च भूरिशः । धृतः स संगरो देवैस्त्रिंशद्वर्षाणि पञ्चकम् ॥ ३ ॥ वर्षाणि दिवसान्मासान्दशाष्टौ सप्त पञ्च च । वर्षाणि पेतुर्वृक्षाग्निहेत्येकाशनिभूभृताम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, इस प्रकार के व्यग्रता बहुल रणारम्भवाले अत्यन्त क्रोधयुक्त प्राणग्राही असुरों ने बड़ा भारी संग्राम सहसा आरम्भ किया । उस युद्ध को देवताओं ने किसी समय एक मात्र वाग्युद्ध से, किसी समय दानादि उपाय द्वारा सन्धि से, किसी समय पलायन से, किसी समय धेय से, छिपकर अपने लोगों की रक्षा करने से, किसी समय कृपण के सदृश शरणागति की याचना आदि से, किसी समय अस्त्रयुद्ध से ओर बार-बार अपने अन्तधनिं से तीस वर्ष तक चलाया, दूसरा युद्ध पाँच वर्ष आठ महीने दस दिन चलाया ओर तीसरा युद्ध बारह वर्ष तक चलाया | तब तक लगातार दोनों सेनाओं में पेड़ों, अग्नियों, आयुधों ओर मुख्य-मुख्य वजो ओर पर्वतो की वृष्टियाँ गिरी

सर्ग सन्दर्भ

अटद्जाईसवाँ सर्ग समाप्त उनतीसवाँ सर्ग दाम आदि के, जिन्हें देवताओं के प्रयत्न से देहाभिमान प्राप्त हो गया था, युद्ध मेँ विषाद का, तदनन्तर पलायन और पराजय का वर्णन ।