Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 3, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
इत्यस्त्यन्तो नं सद्दृष्टेरसद्दृष्टेश्च वा क्वचित् ।
अस्यास्त्वभ्युदितं बुद्धं नाबुद्धं प्रति वानघ ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञो के प्रति सन्मात्रदृष्टि जैसे स्वतः अनन्त है वैसे ही अज्ञो के प्रति असत्, अनृत जगत की
दृष्टि संख्या से अनन्त है, यह कहते हैं।
हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह परम अभ्युदय यानी आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त ज्ञानी के प्रति
इस सद्दृष्टि का अन्त कहीं नहीं है और अज्ञके प्रति इस असत् जगत की दृष्टि का अन्त कहीं नहीं हे