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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 3, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । न संभवति किं ब्रह्मन्सर्गादौ प्राक्तनी स्मृतिः । महाप्रलयसंमोहैर्नश्यति प्राक्स्मृतिः कथम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे प्रतिदिन की युषुप्ति है वैसे ही प्रलय भी है। सुषुप्ति अवस्था में लीन मन के जाग्रतकाल में आविभावि के तुल्य प्रलयकाल में लीन मन का सृष्टि के आरम्भ में आविभाव होने से तदव्यच्छन्न प्रजापति अथवा अन्य के स्मर्ता होने में क्या विरोध है ? इस आशय से श्रीरामचन्द्रजी पूछते हः हे ब्रह्मन्‌, सृष्टि के आरम्भ में पूर्वकल्पीय स्मृति क्यों नहीं हो सकती ? महाप्रलय के प्रबल सम्मोह से पूर्वकल्पीयस्मृति कैसे नष्ट हो जाती है ?