Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, Verses 6–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 3, verses 6–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 6-8
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ये महाप्रलये प्राज्ञाः सर्वे ब्रह्मादयः पुरा ।
किल निर्वाणमायातास्तेऽवश्यं ब्रह्मतां गताः ॥ ६ ॥
प्राक्तनः कः स्मृतेः कर्ता तस्मात्कथय सुव्रत ।
स्मृतिर्निर्मूलतां याता स्मर्तुर्मुक्ततया यतः ॥ ७ ॥
अतः स्मर्तुरभावेन स्मृतिर्वोदेति किं कथम् ।
अवश्यं हि महाकल्पे सर्वे मोक्षैकभागिनः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी के अभिप्राय का प्रकाशन करते हुए श्रीवसिष्ठजी समाधान करते है ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, क्या यह आपकी शंका हिरण्यगर्भरूप एक ही जीव अपने
मन से अनेक जीव, शरीर आदिके भेद की कल्पना कर संसार को प्राप्त होता है। इस मन से है अथवा
अनेक जीव अपने-अपने उपभोग के योग्य प्रपंच की कल्पना करते हुए अपनी बुद्धि के अनुसार सबकी
सृष्टि करनेवाले हिरण्यगर्भ की भी कल्पना करते हैं इस मत से हैं। इस दोनों कल्पो में से द्वितीयकल्प में
महाकल्पान्तसर्यादौ प्रथमोऽसौप्रजापतिः“ इत्यादि आपकी शंका के उपक्रम से विरोध है तथा प्रथम
कल्प में बहुत श्रुतियों की अनुकूलता है, अतः प्रथम कल्प ही उचित होने से परिशिष्ट रहता है। इस
पक्ष में जो पूर्वकल्पीय जीव तथा जगत महाप्रलयकाल में हिरण्यगर्भ की मुक्ति से मुक्त हो गये, वे सभी
ब्रह्मीभूत हो गये यदि अन्य कोई जीव अवशिष्ट रहा नहीं, तो हे सुव्रत, बतलाइये, पूर्वोत्पनन कौन
स्मर्ता है ? क्योंकि स्मर्ता के मुक्त हो जानेसे स्मृति निर्मूलता को प्राप्त हो गई है । इसलिए क्या
स्मरणकर्ता के अभाव से किसी तरह स्मृति उत्पन्न हो सकती है ? महाप्रलय में सब लोग अवश्य मोक्ष
के भागी हो गये, इसलिए इस सर्ग की सिद्धि नहीं हो सकती है